कमरा नंबर 17
उस पुराने विश्रामगृह में मैं पहली बार गया था। शहर से करीब पंद्रह किलोमीटर बाहर, सुनसान सड़क के किनारे बना वह भवन कभी काफी अच्छा रहा होगा। अब उसकी दीवारों पर सीलन थी, बरामदे की ट्यूबलाइट बार-बार झपकती थी और रात होते ही आसपास ऐसी खामोशी छा जाती थी कि अपने कदमों की आवाज़ भी […]
