🌺मैं और मेरा भांजा शुभ 🌺
संजय अवस्थी की कलम से…
कुछ रिश्ते केवल रक्त से नहीं, भावनाओं से बनते हैं। उनमें अधिकार भी होता है, स्नेह भी, सम्मान भी और एक अद्भुत आत्मीयता भी। मामा और भांजे का रिश्ता ऐसा ही एक रिश्ता है। विशेषकर छत्तीसगढ़ की धरती पर तो भांजे को केवल परिवार का सदस्य नहीं माना जाता, बल्कि उसे विशेष सम्मान और शुभता का प्रतीक समझा जाता है।
बचपन से सुनता आया हूँ कि घर में भांजे का आगमन शुभ संकेत माना जाता है। शायद यही कारण है कि हमारे यहाँ भांजे के चरण स्पर्श करने की परंपरा तक रही है। इसके पीछे कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि रिश्तों के प्रति आदर और प्रेम की वह संस्कृति है जिसे हमारे पूर्वजों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोकर रखा है।
मेरी छोटी बहन वर्षों से इंदौर में रहती है। हर साल गर्मी की छुट्टियों में उसका परिवार रायपुर आता है और उन दिनों घर में जैसे एक नया बसंत उतर आता है। बच्चों की चहल-पहल, रसोई की रौनक, देर रात तक चलने वाली बातें और परिवार के बीच गूंजती हँसी पूरे घर को जीवंत कर देती है।
इस वर्ष भी बहन पहले आ गई थी, लेकिन मेरा प्रिय भांजा शुभ अपनी सेमेस्टर परीक्षाओं में व्यस्त था। इसलिए वह साथ नहीं आ पाया। घर में सभी लोग उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। बच्चे पूछते रहते थे—”शुभ भैया कब आएंगे?” और मैं मुस्कुरा कर कह देता था—”बस परीक्षा खत्म होते ही आ जाएगा।”
मेरा भांजा शुभ इंदौर के शासकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय में अध्ययनरत है। पढ़ाई के प्रति उसकी लगन और अनुशासन देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। कुछ दिन पहले मैं उससे उसके भविष्य की योजनाओं के बारे में बात कर रहा था। मैंने सहज ही पूछ लिया, “बेटा, आगे क्या सोच रखा है?”
उसने बड़े आत्मविश्वास से कहा, “मामा, अभी तो मुझे अपनी इंजीनियरिंग पूरी करने में चार वर्ष और लगेंगे। उसके बाद मेरी पहली कोशिश भारतीय सेना में इंजीनियरिंग सेवा के माध्यम से जाने की होगी। वहाँ भी सिविल इंजीनियरों के लिए उत्कृष्ट अवसर होते हैं। यदि वह संभव नहीं हुआ तो मैं संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा दूँगा।”
उसके शब्दों में जो स्पष्टता, आत्मविश्वास और राष्ट्रसेवा का भाव था, उसे सुनकर मेरा मन गर्व से भर गया। लगा कि आने वाली पीढ़ी केवल अपने लिए नहीं, देश के लिए भी सपने देख रही है।
कुछ दिन पहले जब मेरी बहन रायपुर आई थी, तब उसके साथ मेरी भांजी अनुष्का भी थी। अनुष्का बी.डी.एस. अंतिम वर्ष की छात्रा है। शुभ उससे लगभग चार वर्ष छोटा है। वैसे तो कॉलेज में उसका नाम अनुज है, लेकिन परिवार में हम सब उसे प्यार से “शुभ” ही कहते हैं। और सच कहूँ तो उसका व्यक्तित्व भी उसके नाम के अनुरूप ही है—जहाँ जाता है, वहाँ अपनापन और प्रसन्नता बिखेर देता है।
जैसे ही उसकी परीक्षाएँ समाप्त हुईं और पंद्रह दिनों की छुट्टी मिली, उसने बिना समय गंवाए रायपुर आने का निर्णय ले लिया। गर्मी की छुट्टियों के कारण ट्रेनों में आरक्षण मिलना कठिन था, इसलिए उसने बस में तत्काल टिकट कराया और चल पड़ा।
उसके आने वाले दिन की सुबह भी बड़ी रोचक रही।
उस दिन उसके नाना जी प्रातः चार बजे ही जाग गए। उनकी उत्सुकता किसी छोटे बच्चे जैसी थी। पाँच बजे उन्होंने मुझे भी जगा दिया और बोले, “उठो, तैयार हो जाओ, शुभ को लेने जाना है।”
मैंने कहा, “अरे बाबूजी, उसकी बस तो नौ बजे पहुँचेगी।”
लेकिन उनके उत्साह के आगे मेरी एक न चली। आखिरकार आठ बजे ही मुझे घर से रवाना कर दिया गया। मैं साढ़े आठ बजे बस स्टैंड पहुँच गया और प्रतीक्षा करने लगा।
थोड़ी देर बाद मैंने शुभ को फोन किया। उसने हँसते हुए कहा, “मामा, आप चिंता मत कीजिए। मैं बस से उतरकर ऑटो कर लूँगा और घर आ जाऊँगा।”
लेकिन भला ऐसा कैसे हो सकता था?
कुछ ही मिनटों बाद जैसे ही बस पहुँची, मैं अपनी मोटरसाइकिल लेकर उसके सामने जा खड़ा हुआ। मुझे देखकर उसके चेहरे पर जो मुस्कान आई, वह किसी भी यात्रा की थकान मिटाने के लिए पर्याप्त थी।
बस से उतरते ही वह मेरे चरण स्पर्श करने झुका, लेकिन मैंने तुरंत उसे रोक लिया।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “बेटा, हमारे यहाँ भांजे के पैर छुए जाते हैं, भांजे से पैर नहीं छुआए जाते। मैं तेरा पैर पडूंगा जैसे ही मैंने उसके पैर छूने के लिए झुका तो उसने तुरंत अपने मामा को उठा लिया और गले से लगा लिया बेटा तू हमारा सम्मान है, हमारा आशीर्वाद है।”
वह मुस्कुरा दिया और फिर हम दोनों घर की ओर चल पड़े।
घर पहुँचते ही जैसे खुशियों का बाँध टूट गया। नाना जी की आँखों में स्नेह छलक आया। बच्चों ने उसे घेर लिया। घर के हर सदस्य के चेहरे पर प्रसन्नता साफ दिखाई दे रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे घर की अधूरी खुशी आज पूरी हो गई हो।
उसके आने के बाद घर का वातावरण और भी जीवंत हो गया। सुबह की चाय पर चर्चाएँ होने लगीं। कभी पढ़ाई की बातें होतीं, कभी भविष्य की योजनाएँ, तो कभी बचपन की शरारतों का स्मरण।
बच्चों की तो जैसे चाँदी हो गई। कभी उसकी मामी उसे बाजार ले जातीं, कभी मौसियाँ। कभी वह बच्चों के साथ चाऊमीन और मोमोज खाने निकल जाता, तो कभी रायपुर में रहने वाले अपने मौसेरे- ममेरे भाई बहनों के साथ घूमने चला जाता।
लेकिन इन सबके बीच शुभ की एक विशेषता मुझे सबसे अधिक प्रभावित करती है।
आज के समय में जहाँ अधिकांश युवा केवल मोबाइल और सोशल मीडिया तक सीमित हो जाते हैं, वहीं शुभ को रसोई का भी अच्छा ज्ञान है। मालवा की शैली में सब्जी बनाना उसने कहाँ सीखा, यह तो मुझे नहीं मालूम, लेकिन उसके हाथ की बनी सेव की सब्जी सचमुच स्वादिष्ट होती है।
और उसकी चाय…
उसकी चाय तो एक अलग ही कहानी है।
चाय बनाने में उसे आधा घंटा लग जाता है। वह हर सामग्री को बड़े धैर्य से डालता है, धीमी आँच पर उबालता है और फिर बड़े प्रेम से सबको परोसता है। लेकिन जब वह चाय कप में आती है तो उसका स्वाद ऐसा होता है कि बड़े-बड़े होटल और रेस्टोरेंट भी शायद वैसी चाय न बना पाएँ। उस चाय में केवल स्वाद नहीं होता, उसमें अपनापन घुला होता है।
इन दिनों गर्मी अपने चरम पर है। पहले हमने परिवार सहित जगन्नाथ पुरी जाने की योजना बनाई थी, लेकिन भीषण गर्मी को देखते हुए उसे स्थगित करना पड़ा।
फिर विचार आया कि किसी ऐसे स्थान पर चला जाए जहाँ आध्यात्मिक शांति भी मिले और प्रकृति का सौंदर्य भी।
काफी विचार-विमर्श के बाद हमने नरसिंहनाथ धाम जाने का निश्चय किया। उड़ीसा और छत्तीसगढ़ की सीमा के निकट स्थित यह पावन स्थल भगवान नरसिंह को समर्पित है। पहाड़ियों की गोद में स्थित यह स्थान श्रद्धा, शांति और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है। झरनों का निर्मल जल, हरियाली से आच्छादित पर्वत और मंदिर की दिव्यता मन को अद्भुत शांति प्रदान करती है।
लेकिन इस यात्रा में मेरा एक छोटा-सा स्वार्थ भी है।
नरसिंहनाथ जाने से पहले मैं शुभ को महासमुंद जिले के बागबाहरा तहसील स्थित ग्राम घुचापाली में माँ चंडी के दर्शन कराने ले जाऊँगा। मैं जब भी अवसर मिलता है वहाँ जाता हूँ और माँ के चरणों में अपनी प्रार्थनाएँ अर्पित करता हूँ।
इस बार मेरी पहली प्रार्थना अपने भांजे के लिए होगी।
मैं माँ से कहूँगा—
“माँ, इस बच्चे को सद्बुद्धि देना, संस्कार देना, सफलता देना और इसके सपनों को पूरा करने का सामर्थ्य देना।”
उसके बाद ही हमारी यात्रा आगे बढ़ेगी।
मुझे हमेशा लगता है कि जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति धन या वैभव नहीं होती, बल्कि परिवार के साथ बिताए गए ऐसे ही सुखद क्षण होते हैं। समय बीत जाता है, बच्चे बड़े हो जाते हैं, जिम्मेदारियाँ बढ़ जाती हैं, लेकिन स्मृतियाँ हमेशा साथ रहती हैं।
आज शुभ को देखकर मन में गर्व होता है। वह केवल मेरी बहन का बेटा नहीं, बल्कि मेरे लिए पुत्रवत है। उसकी मेहनत, विनम्रता, संस्कार और परिवार के प्रति उसका प्रेम यह विश्वास दिलाते हैं कि उसका भविष्य उज्ज्वल है।
ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि मेरा प्रिय भांजा शुभ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करे, सदैव स्वस्थ और प्रसन्न रहे तथा अपने माता-पिता, परिवार और समाज का नाम रोशन करे।
सच तो यह है कि भांजे के आने से घर में जो मुस्कान लौटती है, उसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता। उसका आगमन केवल एक व्यक्ति का आगमन नहीं होता, वह अपने साथ खुशियाँ, अपनापन, उल्लास और शुभता का पूरा संसार लेकर आता है।
और शायद इसी कारण उसका नाम भी “शुभ” है—
जहाँ जाए, शुभता साथ ले जाए और जहाँ आए, वहाँ खुशियों की रोशनी बिखेर दे।
