संजय अवस्थी की कलम से…

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1: मैं और मेरा भांजा शुभ

कुछ रिश्ते केवल रक्त से नहीं, भावनाओं से बनते हैं। उनमें अधिकार भी होता है, स्नेह भी, सम्मान भी और एक अद्भुत आत्मीयता भी। मामा और भांजे का रिश्ता ऐसा ही एक रिश्ता है। विशेषकर छत्तीसगढ़ की धरती पर तो भांजे को केवल परिवार का सदस्य नहीं माना जाता, बल्कि उसे विशेष सम्मान और शुभता का प्रतीक समझा जाता है। बचपन से सुनता आया हूँ कि घर में भांजे का आगमन शुभ संकेत माना जाता है। शायद यही कारण है कि हमारे यहाँ भांजे के चरण स्पर्श करने की परंपरा तक रही है। इसके पीछे कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि रिश्तों के प्रति आदर और प्रेम की वह संस्कृति है जिसे हमारे पूर्वजों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोकर रखा है। मेरी छोटी बहन वर्षों से इंदौर में रहती है। हर साल गर्मी की छुट्टियों में उसका परिवार रायपुर आता है और उन दिनों घर में जैसे एक नया बसंत उतर आता है। बच्चों की चहल-पहल, रसोई की रौनक, देर रात तक चलने वाली बातें और परिवार के बीच गूंजती हँसी पूरे घर को जीवंत कर देती है। इस वर्ष भी बहन पहले आ गई थी, लेकिन मेरा प्रिय भांजा शुभ अपनी सेमेस्टर परीक्षाओं में व्यस्त था। इसलिए वह साथ नहीं आ पाया। घर में सभी लोग उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। बच्चे पूछते रहते थे—”शुभ भैया कब आएंगे?” और मैं मुस्कुरा कर कह देता था—”बस परीक्षा खत्म होते ही आ जाएगा।” मेरा भांजा शुभ इंदौर के शासकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय में अध्ययनरत है। पढ़ाई के प्रति उसकी लगन और अनुशासन देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। कुछ दिन पहले मैं उससे उसके भविष्य की योजनाओं के बारे में बात कर रहा था। मैंने सहज ही पूछ लिया, “बेटा, आगे क्या सोच रखा है?” उसने बड़े आत्मविश्वास से कहा, “मामा, अभी तो मुझे अपनी इंजीनियरिंग पूरी करने में चार वर्ष और लगेंगे। उसके बाद मेरी पहली कोशिश भारतीय सेना में इंजीनियरिंग सेवा के माध्यम से जाने की होगी। वहाँ भी सिविल इंजीनियरों के लिए उत्कृष्ट अवसर होते हैं। यदि वह संभव नहीं हुआ तो मैं संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा दूँगा।” उसके शब्दों में जो स्पष्टता, आत्मविश्वास और राष्ट्रसेवा का भाव था, उसे सुनकर मेरा मन गर्व से भर गया। लगा कि आने वाली पीढ़ी केवल अपने लिए नहीं, देश के लिए भी सपने देख रही है।

कुछ दिन पहले जब मेरी बहन रायपुर आई थी, तब उसके साथ मेरी भांजी अनुष्का भी थी। अनुष्का बी.डी.एस. अंतिम वर्ष की छात्रा है। शुभ उससे लगभग चार वर्ष छोटा है। वैसे तो कॉलेज में उसका नाम अनुज है, लेकिन परिवार में हम सब उसे प्यार से “शुभ” ही कहते हैं। और सच कहूँ तो उसका व्यक्तित्व भी उसके नाम के अनुरूप ही है—जहाँ जाता है, वहाँ अपनापन और प्रसन्नता बिखेर देता है। जैसे ही उसकी परीक्षाएँ समाप्त हुईं और पंद्रह दिनों की छुट्टी मिली, उसने बिना समय गंवाए रायपुर आने का निर्णय ले लिया। गर्मी की छुट्टियों के कारण ट्रेनों में आरक्षण मिलना कठिन था, इसलिए उसने बस में तत्काल टिकट कराया और चल पड़ा। उसके आने वाले दिन की सुबह भी बड़ी रोचक रही। उस दिन उसके नाना जी प्रातः चार बजे ही जाग गए। उनकी उत्सुकता किसी छोटे बच्चे जैसी थी। पाँच बजे उन्होंने मुझे भी जगा दिया और बोले, “उठो, तैयार हो जाओ, शुभ को लेने जाना है।” मैंने कहा, “अरे बाबूजी, उसकी बस तो नौ बजे पहुँचेगी।” लेकिन उनके उत्साह के आगे मेरी एक न चली। आखिरकार आठ बजे ही मुझे घर से रवाना कर दिया गया। मैं साढ़े आठ बजे बस स्टैंड पहुँच गया और प्रतीक्षा करने लगा। थोड़ी देर बाद मैंने शुभ को फोन किया। उसने हँसते हुए कहा, “मामा, आप चिंता मत कीजिए। मैं बस से उतरकर ऑटो कर लूँगा और घर आ जाऊँगा।” लेकिन भला ऐसा कैसे हो सकता था? कुछ ही मिनटों बाद जैसे ही बस पहुँची, मैं अपनी मोटरसाइकिल लेकर उसके सामने जा खड़ा हुआ। मुझे देखकर उसके चेहरे पर जो मुस्कान आई, वह किसी भी यात्रा की थकान मिटाने के लिए पर्याप्त थी। बस से उतरते ही वह मेरे चरण स्पर्श करने झुका, लेकिन मैंने तुरंत उसे रोक लिया। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “बेटा, हमारे यहाँ भांजे के पैर छुए जाते हैं, भांजे से पैर नहीं छुआए जाते। मैं तेरा पैर पडूंगा जैसे ही मैंने उसके पैर छूने के लिए झुका तो उसने तुरंत अपने मामा को उठा लिया और गले से लगा लिया बेटा तू हमारा सम्मान है, हमारा आशीर्वाद है।” वह मुस्कुरा दिया और फिर हम दोनों घर की ओर चल पड़े। घर पहुँचते ही जैसे खुशियों का बाँध टूट गया। नाना जी की आँखों में स्नेह छलक आया। बच्चों ने उसे घेर लिया। घर के हर सदस्य के चेहरे पर प्रसन्नता साफ दिखाई दे रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे घर की अधूरी खुशी आज पूरी हो गई हो। उसके आने के बाद घर का वातावरण और भी जीवंत हो गया। सुबह की चाय पर चर्चाएँ होने लगीं। कभी पढ़ाई की बातें होतीं, कभी भविष्य की योजनाएँ, तो कभी बचपन की शरारतों का स्मरण। बच्चों की तो जैसे चाँदी हो गई। कभी उसकी मामी उसे बाजार ले जातीं, कभी मौसियाँ। कभी वह बच्चों के साथ चाऊमीन और मोमोज खाने निकल जाता, तो कभी रायपुर में रहने वाले अपने मौसेरे- ममेरे भाई बहनों के साथ घूमने चला जाता। लेकिन इन सबके बीच शुभ की एक विशेषता मुझे सबसे अधिक प्रभावित करती है। आज के समय में जहाँ अधिकांश युवा केवल मोबाइल और सोशल मीडिया तक सीमित हो जाते हैं, वहीं शुभ को रसोई का भी अच्छा ज्ञान है। मालवा की शैली में सब्जी बनाना उसने कहाँ सीखा, यह तो मुझे नहीं मालूम, लेकिन उसके हाथ की बनी सेव की सब्जी सचमुच स्वादिष्ट होती है। और उसकी चाय… उसकी चाय तो एक अलग ही कहानी है। चाय बनाने में उसे आधा घंटा लग जाता है। वह हर सामग्री को बड़े धैर्य से डालता है, धीमी आँच पर उबालता है और फिर बड़े प्रेम से सबको परोसता है। लेकिन जब वह चाय कप में आती है तो उसका स्वाद ऐसा होता है कि बड़े-बड़े होटल और रेस्टोरेंट भी शायद वैसी चाय न बना पाएँ। उस चाय में केवल स्वाद नहीं होता, उसमें अपनापन घुला होता है।

इन दिनों गर्मी अपने चरम पर है। पहले हमने परिवार सहित जगन्नाथ पुरी जाने की योजना बनाई थी, लेकिन भीषण गर्मी को देखते हुए उसे स्थगित करना पड़ा। फिर विचार आया कि किसी ऐसे स्थान पर चला जाए जहाँ आध्यात्मिक शांति भी मिले और प्रकृति का सौंदर्य भी। काफी विचार-विमर्श के बाद हमने नरसिंहनाथ धाम जाने का निश्चय किया। उड़ीसा और छत्तीसगढ़ की सीमा के निकट स्थित यह पावन स्थल भगवान नरसिंह को समर्पित है। पहाड़ियों की गोद में स्थित यह स्थान श्रद्धा, शांति और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है। झरनों का निर्मल जल, हरियाली से आच्छादित पर्वत और मंदिर की दिव्यता मन को अद्भुत शांति प्रदान करती है। लेकिन इस यात्रा में मेरा एक छोटा-सा स्वार्थ भी है। नरसिंहनाथ जाने से पहले मैं शुभ को महासमुंद जिले के बागबाहरा तहसील स्थित ग्राम घुचापाली में माँ चंडी के दर्शन कराने ले जाऊँगा। मैं जब भी अवसर मिलता है वहाँ जाता हूँ और माँ के चरणों में अपनी प्रार्थनाएँ अर्पित करता हूँ। इस बार मेरी पहली प्रार्थना अपने भांजे के लिए होगी। मैं माँ से कहूँगा— “माँ, इस बच्चे को सद्बुद्धि देना, संस्कार देना, सफलता देना और इसके सपनों को पूरा करने का सामर्थ्य देना।” उसके बाद ही हमारी यात्रा आगे बढ़ेगी। मुझे हमेशा लगता है कि जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति धन या वैभव नहीं होती, बल्कि परिवार के साथ बिताए गए ऐसे ही सुखद क्षण होते हैं। समय बीत जाता है, बच्चे बड़े हो जाते हैं, जिम्मेदारियाँ बढ़ जाती हैं, लेकिन स्मृतियाँ हमेशा साथ रहती हैं। आज शुभ को देखकर मन में गर्व होता है। वह केवल मेरी बहन का बेटा नहीं, बल्कि मेरे लिए पुत्रवत है। उसकी मेहनत, विनम्रता, संस्कार और परिवार के प्रति उसका प्रेम यह विश्वास दिलाते हैं कि उसका भविष्य उज्ज्वल है। ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि मेरा प्रिय भांजा शुभ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करे, सदैव स्वस्थ और प्रसन्न रहे तथा अपने माता-पिता, परिवार और समाज का नाम रोशन करे। सच तो यह है कि भांजे के आने से घर में जो मुस्कान लौटती है, उसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता। उसका आगमन केवल एक व्यक्ति का आगमन नहीं होता, वह अपने साथ खुशियाँ, अपनापन, उल्लास और शुभता का पूरा संसार लेकर आता है। और शायद इसी कारण उसका नाम भी “शुभ” है— जहाँ जाए, शुभता साथ ले जाए और जहाँ आए, वहाँ खुशियों की रोशनी बिखेर दे।

2:संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर बढ़ता भारत

विकास की चमक के बीच कहीं पीछे तो नहीं छूट गया परिवार, गांव और संस्कार

भारत को लंबे समय तक गांवों का देश कहा जाता रहा है। हमारे गांव केवल खेत-खलिहान और मिट्टी के घरों का समूह नहीं थे, बल्कि वे भारतीय संस्कृति, परंपरा, संस्कार और सामूहिक जीवन के जीवंत केंद्र थे। एक समय था जब एक ही आंगन में दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची, भाई-बहन और उनके बच्चे साथ रहते थे। घर बड़ा होता था, परिवार बड़ा होता था और रिश्तों के बीच दूरी बहुत छोटी होती थी।

लेकिन पिछले लगभग सात दशकों में भारत ने विकास की एक लंबी यात्रा तय की है। विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, उद्योग, परिवहन और संचार के क्षेत्र में देश ने अभूतपूर्व प्रगति की। गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ा, जीवनशैली बदली और परिवार की परिभाषा भी बदलती चली गई। प्रश्न यह है कि विकास के इस सफर में हमने क्या पाया और क्या खो दिया?

गांव से शहर तक का सफर 1950 से 1975 के बीच भारत के अधिकांश परिवारों का जीवन ग्रामीण परिवेश से गहराई से जुड़ा हुआ था। संयुक्त परिवार सामान्य बात थी। परिवार में चार-पांच भाई हों, उनकी बहनें हों, माता-पिता हों और सभी एक ही छत के नीचे रहते हों—यह किसी को असामान्य नहीं लगता था। फिर शिक्षा का विस्तार हुआ। रोजगार के नए अवसर शहरों में पैदा हुए। सरकारी नौकरियां, कारखाने, उद्योग और व्यापार शहरों में केंद्रित होने लगे। पढ़े-लिखे युवाओं ने गांव छोड़कर शहरों का रुख किया। एक परिवार में यदि पांच भाई थे तो संभव है कि एक भाई गांव में रह गया, जबकि बाकी चार भाई नौकरी या व्यवसाय के लिए शहर चले गए। बहनों की शादी भी शहरों में हो गई। धीरे-धीरे एक ही परिवार के लोग अलग-अलग शहरों में बसते गए। शुरुआत में यह केवल आर्थिक आवश्यकता थी, लेकिन समय के साथ यह जीवनशैली बन गई। शिक्षा बदली, जीवनशैली बदली और परिवार भी बदल गया शहरों में आने के बाद बच्चों की शिक्षा का स्वरूप बदला। अंग्रेजी माध्यम और कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ाई होने लगी। जीवन में सुविधाएं बढ़ीं। कारें आईं, फ्लैट आए, आधुनिक बाजार आए और खान-पान भी बदल गया। जिस बच्चे ने शहर में पिज्जा-बर्गर और आधुनिक जीवनशैली देखी, उसके लिए गांव की तवे पर बनी रोटी, घर की सब्जी और टमाटर की चटनी धीरे-धीरे पुरानी चीजें लगने लगीं। यह केवल भोजन का परिवर्तन नहीं था। यह जीवन के दृष्टिकोण में आया परिवर्तन था। जिस बच्चे के लिए पहले दादा-दादी की कहानी मनोरंजन थी, वह अब मोबाइल स्क्रीन पर व्यस्त हो गया। जिस घर में शाम को पूरा परिवार एक साथ बैठकर भोजन करता था, वहां धीरे-धीरे हर व्यक्ति का अपना कमरा, अपना मोबाइल और अपनी दुनिया बनती चली गई। संयुक्त परिवार क्यों टूटता गया? संयुक्त परिवार के टूटने के पीछे केवल एक कारण नहीं है। इसके पीछे अनेक सामाजिक और आर्थिक कारण हैं। शहरों में सीमित आवास, नौकरी की अनिश्चितता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती इच्छा, पति-पत्नी दोनों का नौकरी करना, बच्चों की शिक्षा, बढ़ती जीवन-यापन लागत और बदलती जीवनशैली—इन सभी ने परिवार के स्वरूप को प्रभावित किया। लेकिन इसके साथ एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ—’हम’ की जगह ‘मैं’ ने लेना शुरू कर दिया। संयुक्त परिवार में कमाने वाला एक व्यक्ति केवल अपने लिए नहीं, पूरे परिवार के लिए कमाता था। किसी एक सदस्य की परेशानी पूरे परिवार की परेशानी होती थी और किसी एक की खुशी पूरे परिवार की खुशी। आज एकल परिवार में पति-पत्नी और एक-दो बच्चे ही पूरा संसार बन गए हैं। यह व्यवस्था सुविधाजनक अवश्य है, लेकिन संकट के समय इसकी कमजोरियां भी सामने आती हैं। संकट के समय परिवार की असली ताकत समझ आती है मान लीजिए किसी संयुक्त परिवार में पांच भाई रहते थे। यदि किसी एक भाई की असमय मृत्यु हो जाए तो उसके पीछे छूटे पत्नी और बच्चों को संभालने के लिए चार भाई खड़े होते थे। दादा-दादी बच्चों का सहारा बनते थे। चाचा पिता की भूमिका निभाते थे और पूरा परिवार उस संकट को अपना संकट समझता था। आज एकल परिवार में यदि कमाने वाले व्यक्ति की अचानक मृत्यु हो जाए तो पीछे रह गई पत्नी और छोटे बच्चों के सामने जीवन का संघर्ष अचानक बहुत बड़ा हो जाता है। आर्थिक संकट, मानसिक दबाव, बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा—सब कुछ एक साथ सामने आ खड़ा होता है। ऐसी परिस्थितियों में असहाय परिवारों का शोषण होने का खतरा भी बढ़ जाता है। यही वह स्थान है जहां संयुक्त परिवार की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था दिखाई देती है। संयुक्त परिवार केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं था; वह अपने आप में एक सामाजिक सुरक्षा तंत्र था। गांव भी खाली हुए और खेत भी बिकने लगे परिवार के बिखराव के साथ गांव भी बदलने लगे। जो गांव कभी खेती और पशुपालन से आत्मनिर्भर थे, वहां से युवा पीढ़ी रोजगार की तलाश में शहरों की ओर निकलने लगी। पहले रोजगार के लिए शहर जाने वाला व्यक्ति कभी-कभी वापस गांव लौट आता था। लेकिन जब उसके बच्चे शहर में पढ़ने लगे, उनका भविष्य शहर से जुड़ गया और परिवार ने शहर में घर बना लिया, तब गांव लौटना धीरे-धीरे कठिन होता गया। आज स्थिति यह है कि शहरों के आसपास के अनेक गांव तेजी से शहरी बस्तियों में बदल रहे हैं। खेत प्लॉट में बदल रहे हैं। जिस भूमि पर कभी गेहूं, धान, दाल और सब्जियां उगती थीं, वहां अब कॉलोनियां खड़ी हो रही हैं। किसान भी सोचता है कि यदि खेती में इतना निवेश करने के बाद सीमित लाभ मिलता है तो जमीन बेचकर या उसका उपयोग बदलकर अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। यह केवल जमीन का परिवर्तन नहीं है। यह हमारी कृषि संस्कृति और ग्रामीण जीवन के बदलते स्वरूप का संकेत है। परिवार छोटा हुआ तो आने वाली पीढ़ी भी छोटी होती गई संयुक्त परिवार के साथ-साथ परिवार का आकार भी छोटा होता गया। एक समय चार-पांच बच्चों वाला परिवार सामान्य माना जाता था। फिर दो बच्चे आदर्श माने जाने लगे और अब अनेक परिवारों में एक बच्चा ही पर्याप्त समझा जाने लगा है। इसके पीछे शिक्षा, महंगाई, रोजगार, करियर और जीवनशैली जैसे अनेक कारण हैं। लेकिन इसका एक सामाजिक परिणाम भी है। जिस घर में पहले चार भाई-बहन एक-दूसरे के साथ बड़े होते थे, वहां अब एक बच्चा अकेले बड़ा हो रहा है। उसके पास खेलने के लिए भाई-बहन नहीं, अनुभव बांटने के लिए दादा-दादी नहीं और हर परिस्थिति में साथ खड़े होने वाला बड़ा परिवार नहीं। आज हम बच्चे को बेहतर सुविधाएं तो दे रहे हैं, लेकिन क्या हम उसे उतने ही मजबूत रिश्ते दे पा रहे हैं? यह प्रश्न विचारणीय है। विकास आवश्यक है, लेकिन विकास की दिशा भी महत्वपूर्ण है यह कहना उचित नहीं होगा कि विज्ञान, तकनीक, शिक्षा या शहरीकरण गलत हैं। वास्तव में भारत की प्रगति के लिए ये सभी आवश्यक हैं। प्रश्न विकास का नहीं, विकास के साथ मानवीय मूल्यों को बचाए रखने का है। हमें विज्ञान चाहिए, लेकिन संवेदनहीनता नहीं। हमें शहर चाहिए, लेकिन गांव नहीं खोने चाहिए। हमें आधुनिक शिक्षा चाहिए, लेकिन संस्कारों की कीमत पर नहीं। हमें आर्थिक समृद्धि चाहिए, लेकिन रिश्तों की कीमत पर नहीं। हमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता चाहिए, लेकिन परिवार के प्रति जिम्मेदारी भूलकर नहीं। क्या भविष्य हमें वापस गांव की ओर ले जाएगा? आज जब दुनिया के अनेक हिस्सों में युद्ध, तनाव, बेरोजगारी, मानसिक दबाव और सामाजिक अकेलापन बढ़ रहा है, तब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि भविष्य किस दिशा में जाएगा? क्या मनुष्य लगातार शहरों, तकनीक और कृत्रिम सुविधाओं की ओर बढ़ता जाएगा? या फिर एक दिन उसे समझ आएगा कि जीवन की वास्तविक शांति केवल ऊंची इमारतों और महंगी गाड़ियों में नहीं, बल्कि रिश्तों, प्रकृति, परिवार और सामाजिक जुड़ाव में भी है? संभव है आने वाले समय में लोग गांवों की ओर फिर लौटें। संभव है आधुनिक तकनीक के सहारे गांव में रहकर भी दुनिया से जुड़ा जा सके। कृषि आधुनिक हो, रोजगार गांव में मिले और शिक्षा की अच्छी व्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रों में हो तो शायद गांव फिर से जीवन का केंद्र बन सकें। लेकिन इसके लिए हमें केवल गांव बचाने की बात नहीं करनी होगी। हमें गांव की आत्मा बचानी होगी। संस्कार ही वह सूत्र है जो परिवार को जोड़ सकता है परिवार को केवल एक छत नहीं जोड़ती। परिवार को जोड़ते हैं—विश्वास, त्याग, धैर्य, सम्मान और संस्कार।आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों को केवल यह न सिखाएं कि जीवन में कितना कमाना है; उन्हें यह भी सिखाएं कि रिश्तों को कैसे निभाना है। उन्हें यह भी बताना होगा कि दादा-दादी केवल पुराने विचारों वाले लोग नहीं हैं, बल्कि वे परिवार की स्मृतियों और अनुभवों की चलती-फिरती पुस्तक हैं। उन्हें यह समझाना होगा कि गांव पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की जड़ है। और उन्हें यह भी बताना होगा कि आधुनिक होना अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है। आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं? आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां एक ओर तकनीक की अभूतपूर्व शक्ति है और दूसरी ओर मनुष्य के भीतर बढ़ता अकेलापन। एक ओर गगनचुंबी इमारतें हैं, दूसरी ओर खाली होते गांव। एक ओर लग्जरी जीवन है, दूसरी ओर टूटते रिश्ते। एक ओर डिजिटल संपर्क है, दूसरी ओर वास्तविक संवाद का अभाव। एक ओर आर्थिक विकास है, दूसरी ओर रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की चिंता। इसलिए सवाल यह नहीं कि संयुक्त परिवार अच्छा था या एकल परिवार। सवाल यह है कि हम एकल परिवार में रहते हुए भी संयुक्त परिवार की आत्मा कैसे बचा सकते हैं? यदि माता-पिता वृद्ध हैं तो उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा? यदि भाई संकट में है तो उसके साथ कौन खड़ा होगा? यदि किसी परिवार का कमाने वाला व्यक्ति नहीं रहा तो उसके बच्चों का हाथ कौन पकड़ेगा? और यदि आने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों से ही कट गई तो उसे संस्कार कौन देगा? इन प्रश्नों के उत्तर केवल सरकार नहीं दे सकती। इनका उत्तर समाज को और प्रत्येक परिवार को स्वयं देना होगा। अंतिम प्रश्न भारत का भविष्य केवल उसकी अर्थव्यवस्था, तकनीक और शहरों से तय नहीं होगा। भारत का भविष्य इस बात से भी तय होगा कि उसके परिवार कितने मजबूत हैं, उसके गांव कितने जीवंत हैं और उसकी नई पीढ़ी अपने संस्कारों से कितनी जुड़ी हुई है। संयुक्त परिवार की हर व्यवस्था को जस का तस वापस लाना शायद संभव नहीं है और न ही आवश्यक। लेकिन संयुक्त परिवार की भावना—एक-दूसरे के सुख-दुःख में साथ खड़े होने की भावना—आज भी बचाई जा सकती है। हमें ऐसा भारत चाहिए जहां विज्ञान भी हो और संस्कार भी; शहर भी हों और गांव भी; आधुनिकता भी हो और परंपरा भी; व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी हो और पारिवारिक जिम्मेदारी भी। क्योंकि अंततः मनुष्य कितना भी आधुनिक क्यों न हो जाए, संकट की घड़ी में उसे किसी मशीन की नहीं, किसी अपने के कंधे की जरूरत पड़ती है। शायद यही वह सत्य है जिसे हम विकास की दौड़ में कहीं पीछे छोड़ते जा रहे हैं। इसलिए आज आवश्यकता विकास रोकने की नहीं, बल्कि विकास को मानवीय बनाने की है। और शायद आने वाली पीढ़ी के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही होगा— “हमने दुनिया तो बहुत बड़ी बना ली, लेकिन क्या अपने घर को बचा पाए?”

3: नया लेख

जल्द ही ….

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