अकेला

शाम के सात बज चुके थे। बाहर बारिश की बूँदें छज्जे से टपक रही थीं। दरवाज़ा खुला और रवि थके कदमों से घर के भीतर आया। हाथ में सब्ज़ियों का थैला था, कंधे पर दफ़्तर का बैग और चेहरे पर वही रोज़ वाली थकान।

“पापा आ गए!” यह आवाज़ तो कभी इस घर में गूँजती ही नहीं थी।

बेटे ने मोबाइल से नज़र तक नहीं उठाई। बेटी ने कानों में ईयरफ़ोन लगा रखे थे। पत्नी रसोई से बोली, “आ गए? चीनी लाए? और हाँ, गैस का बिल भर दिया न?”

रवि ने मुस्कुराकर थैला मेज़ पर रख दिया। किसी ने यह नहीं पूछा कि दिन कैसा रहा।

उसे आदत हो चुकी थी।

घर में उसकी पहचान अब किसी इंसान की नहीं, बल्कि एक व्यवस्था की थी। जैसे बिजली का मीटर, पानी की टंकी या एटीएम मशीन—ज़रूरत पड़े तो याद करो, बाकी समय उसके होने या न होने से किसी को कोई फ़र्क नहीं।

रवि कभी-कभी सोचता, “क्या सचमुच मैं इस घर का मुखिया हूँ? या सिर्फ़ कमाने वाली एक मशीन?”

घर में हर किसी की अपेक्षाएँ थीं।

पत्नी चाहती थी कि हर महीने खर्च बिना किसी सवाल के पूरे हों।

बेटा चाहता था कि नई बाइक, नया मोबाइल और दोस्तों जैसी ज़िंदगी मिले।

बेटी की इच्छाएँ भी छोटी नहीं थीं।

लेकिन रवि की इच्छा?

किसी ने कभी पूछी ही नहीं।

वह चाहता था कि कोई एक दिन उससे कहे— “आज आप बैठिए, चाय हम बना देते हैं।”

वह चाहता था कि कोई उसके सिर पर हाथ रखकर पूछे— “बहुत थक गए होंगे?”

लेकिन शायद मुखिया थकता नहीं।

कम-से-कम उसके घर में तो नहीं।

एक दिन बेटे ने देर रात लौटकर दरवाज़ा खटखटाया।

रवि ने दरवाज़ा खोला और शांत स्वर में कहा, “बेटा, रात बहुत हो जाती है। कम-से-कम एक फ़ोन कर दिया करो।”

बस इतनी-सी बात थी।

बेटे का चेहरा तमतमा उठा।

“पापा, मैं बच्चा नहीं हूँ। हर बात में टोकना ज़रूरी है क्या?”

रवि चुप हो गया।

पत्नी तुरंत बेटे के पक्ष में बोली, “अब जवान लड़का है। इतनी रोक-टोक अच्छी नहीं लगती।”

रवि मुस्कुरा दिया।

अजीब बात थी…

जब वही बेटा पैसों की ज़रूरत बताता, तब वह जवान नहीं होता था।

जब फ़ीस भरनी होती, बाइक लेनी होती, मोबाइल बदलना होता, तब पिता की ज़िम्मेदारी याद रहती थी।

लेकिन सलाह?

उस पर बेटे को अपनी आज़ादी याद आ जाती थी।

उस रात रवि देर तक छत पर बैठा रहा।

बारिश रुक चुकी थी।

आसमान में बादल छँट रहे थे।

लेकिन उसकी आँखें भीग चुकी थी।

उम्र के इस पड़ाव पर उसे पैसों की कमी नहीं खलती थी।

कमी थी तो केवल अपनेपन की।

उसे एहसास हुआ कि इस घर में उसकी ज़रूरतें नहीं, केवल उसकी ज़िम्मेदारियाँ रहती हैं।

उसका सम्मान नहीं, केवल उसकी उपयोगिता बची है।

उस रात उसने पहली बार भगवान से कुछ माँगा।

धन नहीं।

लंबी उम्र नहीं।

बस इतना कि—

“हे प्रभु, यदि किसी घर का मुखिया बनाना, तो उसके हिस्से में केवल कर्तव्य मत लिखना। उसके लिए कुछ अपनापन, कुछ सम्मान और थोड़ा-सा सुनने वाला मन भी लिख देना। क्योंकि घर का सबसे मज़बूत दिखने वाला आदमी ही अक्सर घर का सबसे अकेला आदमी होता है।”

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