कमरा नंबर 17

उस पुराने विश्रामगृह में मैं पहली बार गया था।

शहर से करीब पंद्रह किलोमीटर बाहर, सुनसान सड़क के किनारे बना वह भवन कभी काफी अच्छा रहा होगा। अब उसकी दीवारों पर सीलन थी, बरामदे की ट्यूबलाइट बार-बार झपकती थी और रात होते ही आसपास ऐसी खामोशी छा जाती थी कि अपने कदमों की आवाज़ भी अजीब लगती थी।

मुझे अगले दिन सुबह एक गाँव में जाना था। रात हो चुकी थी, इसलिए वहीं रुकने का फैसला किया।

रिसेप्शन पर एक बूढ़ा आदमी बैठा था।

उसने रजिस्टर मेरी तरफ बढ़ाते हुए पूछा,
“नाम?”

मैंने नाम लिखा।

“कमरा नंबर बारह दे देता हूँ।”

चाबी देते समय उसने अचानक मेरी तरफ देखा और बोला,
“रात में अगर कोई आवाज़ आए तो दरवाज़ा मत खोलिएगा।”

मैं हँस पड़ा।

“क्यों? चोर आते हैं क्या?”

वह भी मुस्कुराया नहीं।

“नहीं साहब। चोर होते तो अच्छा था।”

मैंने सोचा, बूढ़ा आदमी मज़ाक कर रहा है।

चाबी लेकर कमरे में चला गया।


रात करीब बारह बजे तक मैं अपने काम में लगा रहा। फिर सोने की कोशिश की।

नींद आई ही थी कि अचानक मेरी आँख खुल गई।

कमरे में अँधेरा था।

मैंने मोबाइल उठाकर समय देखा।

2:17।

उसी समय दरवाज़े पर दस्तक हुई।

ठक… ठक… ठक…

मैं कुछ देर चुप रहा।

फिर बाहर से एक लड़की की आवाज़ आई—

“भैया… दरवाज़ा खोलिए।”

आवाज़ बहुत धीमी थी।

मैं बिस्तर से उठकर दरवाज़े तक गया, लेकिन खोलने से पहले मुझे बूढ़े की बात याद आ गई।

मैंने पीपहोल से बाहर देखा।

गलियारा खाली था।

“कौन है?” मैंने अंदर से पूछा।

कोई जवाब नहीं मिला।

कुछ सेकंड बाद फिर आवाज़ आई—

“भैया… मुझे बहुत ठंड लग रही है।”

इस बार आवाज़ इतनी पास से आई कि मेरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।

मैंने दरवाज़ा नहीं खोला।

कुछ देर बाद सब शांत हो गया।

सुबह मैंने रिसेप्शन पर जाकर पूछा,

“कल रात कोई लड़की यहाँ आई थी क्या?”

बूढ़े ने मेरी तरफ देखा।

“आपने आवाज़ सुनी?”

मैंने सिर हिलाया।

उसने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा,

“कमरा नंबर सत्रह के पास मत जाइएगा।”

“क्यों?”

वह बोला,
“बारह साल पहले वहाँ एक लड़की मरी थी। तब से…”

वह बात अधूरी छोड़कर चुप हो गया।

मैंने पूछा,
“क्या हुआ था उसके साथ?”

उसने कहा,
“पुलिस ने कहा था कि आत्महत्या है। लेकिन मुझे कभी यकीन नहीं हुआ।”

“और कमरा?”

“तब से बंद है।”

मैंने सहजता से पूछा,
“कमरा नंबर सत्रह कहाँ है?”

उसने सामने वाले गलियारे की ओर इशारा किया।

“बस वहाँ। लेकिन जाने की जरूरत नहीं है।”


मुझे जितना मना किया गया, मेरी उत्सुकता उतनी ही बढ़ती गई।

दोपहर में मैं चुपचाप कमरा नंबर सत्रह के सामने जा पहुँचा।

दरवाज़े पर पुराना ताला लगा था।

दरवाज़े के ऊपर कमरे का नंबर अभी भी साफ दिखाई दे रहा था।

17

ताले पर धूल जमी थी।

मैं वापस लौटने ही वाला था कि मेरी नजर दरवाज़े के नीचे पड़ी।

अंदर से हल्की-सी आवाज़ आ रही थी।

जैसे कोई धीरे-धीरे चल रहा हो।

मैं कुछ सेकंड वहीं खड़ा रहा।

फिर खुद को समझाया कि शायद चूहे होंगे।

मैं वापस अपने कमरे में आ गया।

लेकिन उस रात मुझे नींद नहीं आई।

करीब दो बजे फिर वही आवाज़ आई।

ठक… ठक… ठक…

इस बार आवाज़ मेरे कमरे के दरवाज़े से नहीं आई।

वह दीवार की तरफ से आई थी।

मैंने ध्यान से सुना।

फिर वही लड़की बोली—

“आपको सच जानना है न?”

मैं बिस्तर से उठ बैठा।

कमरे की दूसरी दीवार पर एक पुरानी अलमारी लगी थी।

न जाने क्यों मुझे लगा कि आवाज़ उसके पीछे से आ रही है।

मैंने अलमारी हटाई।

पीछे दीवार में एक छोटा-सा दरवाज़ा था।

दरवाज़ा बंद नहीं था।

अंदर एक संकरा रास्ता था।

मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ गए।

फिर भी मैं टॉर्च लेकर अंदर चला गया।

रास्ता कुछ ही मीटर बाद कमरे नंबर सत्रह में खुलता था।


कमरा बिल्कुल वैसा नहीं था जैसा मैंने सोचा था।

वहाँ कोई भूत नहीं था।

बस धूल, पुराना फर्नीचर और एक टूटी हुई मेज थी।

मेज पर एक डायरी पड़ी थी।

मैंने उसे खोला।

पहले कुछ पन्नों पर सामान्य बातें थीं।

फिर आखिरी पन्नों में लिखावट बदल गई थी।

एक जगह लिखा था—

“मुझे अब समझ आ गया है कि पापा की मौत दुर्घटना नहीं थी।”

अगली पंक्ति—

“जिस आदमी पर पापा सबसे ज्यादा भरोसा करते थे, वही उनके पैसे निकाल रहा था।”

और आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक नाम था—

शेखर।

मैं उस नाम को पहचानता था।

शेखर उसी विश्रामगृह का वर्तमान प्रबंधक था।

तभी पीछे से आवाज़ आई—

“डायरी पढ़ ली?”

मेरे हाथ से डायरी लगभग गिर गई।

मैंने पीछे देखा।

दरवाज़े पर शेखर खड़ा था।

उसके हाथ में पिस्तौल थी।

“आपको यहाँ नहीं आना चाहिए था,” उसने कहा।

मैंने पूछा,
“मीरा को आपने मारा था?”

वह कुछ देर मुझे देखता रहा।

फिर बोला,

“हाँ।”

इतनी आसानी से उसने यह बात कह दी कि मैं कुछ क्षण उसे देखता ही रह गया।

“उसके पिता को भी?”

उसने सिर झुका लिया।

“उनके पैसे मैंने निकाले थे। मीरा को सब पता चल गया था। उस रात वह मुझे ब्लैकमेल करने की धमकी दे रही थी। गुस्से में मैंने…”

वह चुप हो गया।

मैंने पूछा,
“लेकिन पुलिस को कैसे लगा कि दरवाज़ा अंदर से बंद था?”

वह बोला,

“क्योंकि मैं इस रास्ते से बाहर निकल गया था।”

उसने दीवार के पीछे बने रास्ते की तरफ इशारा किया।

“लोगों को डराने के लिए मैंने बाद में भूत की कहानियाँ फैला दीं। कोई इस कमरे के पास नहीं आता था।”

उसकी बात सुनकर मुझे लगा कि रहस्य सुलझ गया।

लेकिन तभी…

कमरे के कोने में रखी पुरानी घड़ी चलने लगी।

टिक… टिक… टिक…

हम दोनों ने उसकी तरफ देखा।

घड़ी बारह साल से बंद थी।

अब उसकी सुइयाँ धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थीं।

फिर रुक गईं।

2:17।

शेखर का चेहरा बदल गया।

“यह कैसे हो सकता है?”

उसी समय कमरे में लड़की की आवाज़ गूँजी—

“शेखर…”

शेखर पीछे हट गया।

“नहीं…”

आवाज़ फिर आई—

“तुमने कहा था… कोई सच कभी सामने नहीं आएगा।”

मैंने शेखर की तरफ देखा।

उसके हाथ से पिस्तौल गिर गई।

वह काँपते हुए बोला,

“मीरा…”

कमरे की खिड़की अपने-आप खुल गई।

ठंडी हवा अंदर आई।

पर्दा हिला।

और फिर सब शांत हो गया।


पुलिस आई तो शेखर ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया।

उसने मीरा और उसके पिता की हत्या की पूरी कहानी बता दी।

मामला बारह साल बाद सुलझ गया।

लेकिन एक बात आज तक मेरी समझ में नहीं आई।

पुलिस ने मुझसे पूछा था,

“आपने कहा कि कमरे में किसी लड़की की आवाज़ आई थी?”

मैंने कहा,
“हाँ।”

उन्होंने कमरे की तलाशी ली।

कोई रिकॉर्डर नहीं मिला।

कोई स्पीकर नहीं मिला।

कुछ भी नहीं।

लेकिन मेरा मोबाइल उस रात रिकॉर्डिंग पर था।

मैंने रिकॉर्डिंग पुलिस को दे दी।

उसमें शेखर की आवाज़ साफ थी।

फिर उसकी स्वीकारोक्ति के बाद कुछ सेकंड तक बिल्कुल खामोशी थी।

और उसके बाद एक लड़की की आवाज़ आई—

“अब मुझे जाना है।”

फिर तीन बार दस्तक सुनाई दी।

ठक… ठक… ठक…

उसके बाद रिकॉर्डिंग खत्म हो गई।

आज उस घटना को कई साल हो चुके हैं।

विश्रामगृह अब नहीं है।

उसकी जगह एक नया भवन बन गया है।

लेकिन मैंने उस पुराने भवन की एक तस्वीर संभालकर रखी है।

कभी-कभी रात में जब नींद नहीं आती, मैं वह तस्वीर देखता हूँ।

और हर बार मेरी नजर उसी जगह जाकर रुक जाती है—

कमरा नंबर 17।

क्योंकि उस कमरे की सबसे डरावनी बात यह नहीं थी कि वहाँ कोई भूत था।

सबसे डरावनी बात यह थी कि…

बारह साल तक एक सच उसी कमरे में बंद रहा, और उसे बाहर निकालने के लिए किसी इंसान को नहीं, एक आवाज़ को इंतज़ार करना पड़ा।

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