अंतर्मन [Inner-voice]

अंतर्मन [Inner-voice]

अकेला

शाम के सात बज चुके थे। बाहर बारिश की बूँदें छज्जे से टपक रही थीं। दरवाज़ा खुला और रवि थके कदमों से घर के भीतर आया। हाथ में सब्ज़ियों का थैला था, कंधे पर दफ़्तर का बैग और चेहरे पर वही रोज़ वाली थकान। “पापा आ गए!” यह आवाज़ तो कभी इस घर में गूँजती […]

अंतर्मन [Inner-voice]

खिड़की जो कहीं नहीं जाती

कमरे में एक खिड़की है,जो खुलती तो है,पर कहीं जाती नहीं। हवा आती है—जैसे किसी और की ज़िंदगी की खबर हो,जो मुझ तक बस छूकर लौट जाती है। मैं यहाँ रहता हूँ,पर “रहना” भी अजीब शब्द है—जैसे कोई किराये का एहसास हो,जिसकी मियाद हर महीने खत्म हो जाती है। दिन में लोग मिलते हैं,बातें भी

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