रायपुर की वह यात्रा आज भी याद आते ही चेहरे पर मुस्कान ले आती है।
कुछ वर्ष पहले मैं एक काम से रायपुर गया था। मेरी पत्नी भी साथ थीं। संयोग से उन्हीं दिनों हमारी एक रिश्तेदार, जिन्हें हम यहाँ बुआजी कहेंगे, हमसे मिलने आई हुई थीं।
एक दिन बाजार में मेरी मुलाकात मेरे एक सहकर्मी के रिश्तेदार से हो गई। जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं उनके प्रिय रिश्तेदार के साथ काम करता हूँ, वे इतने प्रसन्न हुए मानो वर्षों बाद कोई खोया हुआ संबंधी मिल गया हो।
“सर, अब तो आपको हमारे घर आना ही पड़ेगा!”
मैंने विनम्रता से कहा, “आज कुछ काम है, फिर कभी।”
लेकिन वे भी कम जिद्दी नहीं थे।
“ठीक है, कल चलेंगे। मैं खुद लेने आ जाऊँगा।”
मैंने सोचा, यह तो सिर्फ औपचारिकता है। लोग अक्सर ऐसा कह देते हैं।
लेकिन अगले दिन सुबह-सुबह घर के बाहर कार का हॉर्न बजा।
बाहर निकला तो देखा, वे स्वयं मुस्कुराते हुए खड़े हैं।
“चलिए, आज कोई बहाना नहीं चलेगा।”
अब बचने का कोई रास्ता नहीं था।
उन्होंने आग्रहपूर्वक मुझे, मेरी पत्नी और बुआजी को कार में बैठाया और अपने घर ले गए।
स्वागत में नाश्ते की प्लेटें, मिठाइयाँ, नमकीन, फल—सब कुछ मेज पर सज चुका था।
बातों-बातों में पता चला कि हमारे मेज़बान और बुआजी एक ही स्कूल में साथ पढ़े थे।
बस फिर क्या था! फिर पुरानी यादों का पिटारा खुल गया।
मेज़बान महोदय की आँखों में पुरानी स्मृतियों की चमक आ गई।
मेज़बान महोदय भावुक स्वर में बोले,
“अरे, ये तो हमारे स्कूल की सबसे होनहार छात्रा थीं!”
बुआजी मुस्कुरा दीं।
उन्होंने आगे कहा,
“पढ़ाई में तेज़, भाषण में प्रथम, और सबसे बड़ी बात…”
उन्होंने एक नाटकीय विराम लिया।
“…पूरे स्कूल की सबसे सुंदर लड़की!”
बुआजी की मुस्कान कानों तक पहुँच गई।
मैंने देखा, मेरी पत्नी धीरे से मेरी ओर देखकर मुस्कुरा रही थीं। शायद उन्हें अंदाज़ा हो गया था कि कहानी अभी आगे बढ़ेगी।
तभी मुख्य द्वार खुला और उनकी धर्मपत्नी घर में प्रवेश कर गईं।
उन्होंने आते ही अंतिम वाक्य सुना—
“…पूरे स्कूल में इन जैसा कोई नहीं था।”
उनकी धर्मपत्नी जी ने एक नज़र अपने पति पर डाली।
फिर बुआजी पर।
बस!
यहीं से कहानी ने यू-टर्न लिया।
“अच्छा! बहुत जानकारी है आपको?”
मेज़बान साहब ने मुस्कुराते हुए कहा,
“अरे, स्कूल की बातें हैं।”
“स्कूल की बातें हैं या दिल की बातें हैं?”
मैंने तुरंत पानी का गिलास उठा लिया ताकि हँसी छिपा सकूँ।
लेकिन उनकी धर्मपत्नी तो अब पूरी फॉर्म में आ चुकी थीं।
“शादी को पच्चीस साल हो गए। मेरी तारीफ़ करते हुए तो मैंने कभी नहीं सुना कि मैं सुंदर हूँ।”
मेज़बान साहब ने स्थिति संभालने की कोशिश की।
“अरे भाग्यवान, तुम भी सुंदर हो।”
“भी सुंदर हूँ? मतलब असली सुंदर तो कोई और थी?”
अब बेचारे साहब के चेहरे से रंग उड़ने लगा।
उनकी धर्मपत्नी जी रुकी नहीं।
“और बताइए, स्कूल में और कौन-कौन सुंदर था? पूरी सूची तैयार कर लीजिए।”
मैंने देखा कि मेज़बान साहब अब चाय नहीं पी रहे थे, चाय उन्हें पी रही थी।
उन्होंने हकलाते हुए कहा,
“मैं तो बस पुरानी यादें बता रहा था।”
उनकी धर्मपत्नी जी बोलीं,
“इतनी पुरानी यादें आपको याद हैं, लेकिन कल मैंने जो सब्ज़ी लाने को कहा था, वह भूल गए थे!”
मेरी पत्नी सिर झुकाकर मुस्कुरा रही थीं। मैं हँसी रोकने के लिए कप को होंठों से लगाए बैठा था। बुआजी कभी इधर देखतीं, कभी उधर।
माहौल इतना हास्यास्पद हो चुका था कि यदि हममें से किसी की हँसी छूट जाती, तो शायद स्थिति और विस्फोटक हो जाती।
कुछ देर बाद माहौल ऐसा हो गया कि हम सबको लगने लगा कि अब निकल लेना ही बुद्धिमानी है।
हमने जल्दी से विदा ली।
घर से बाहर निकलते ही जैसे ही कार थोड़ी दूर पहुँची, पहले मेरी पत्नी हँसीं।
फिर मैं हँसा।
फिर बुआजी हँसीं।
और अगले पाँच मिनट तक कार ठहाकों से गूँजती रही।
बुआजी ने आखिर कहा,
“मेरी सुंदरता की तारीफ़ तो बहुत लोगों ने की होगी, लेकिन आज पहली बार किसी और की ऐसी पूजा होते देखी!”
इस पर हम सब फिर हँस पड़े।
आज भी जब वह घटना याद आती है तो एक बात समझ में आती है—
किसी विवाहित पुरुष को अपनी पुरानी सहपाठिन की सुंदरता की तारीफ़ उतनी ही सावधानी से करनी चाहिए, जितनी सावधानी से कोई व्यक्ति गैस सिलेंडर के पास माचिस जलाता है।
क्योंकि एक छोटी-सी चिंगारी कब “घरेलू गृहयुद्ध” में बदल जाए, कोई नहीं जानता! 😄
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