इंदौर से दिल्ली जाने वाली ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म छोड़ रही थी। डिब्बे में हल्की सफेद रोशनी फैल रही थी। खिड़की के बाहर शहर की भागती रोशनियाँ पीछे छूटती जा रही थीं।
मेरी सीट के ठीक सामने एक लड़का और एक लड़की बैठे थे। दोनों की उम्र मुश्किल से बाइस-तेइस साल होगी। महंगे कपड़े, हाथ में चमकते iPhone, कानों में वायरलेस ईयरबड्स और बातों में शहर वाला आत्मविश्वास। शायद कॉलेज के दोस्त थे या उससे कुछ ज़्यादा।
ट्रेन आगे बढ़ी तो चाय वाला आया—
“चाय… गरमा गरम चाय…”
लड़की ने मुस्कुराकर कहा,
“भैया, दो चाय देना।”
चाय वाले ने कागज़ के कप पकड़ाए। लड़के ने जेब से मोबाइल निकाला।
“QR code है?”
चाय वाले ने तुरंत अपनी छोटी-सी मुड़ी हुई पर्ची आगे कर दी। उस पर फीका पड़ा QR कोड छपा था। लड़के ने मोबाइल कैमरा खोला, स्क्रीन पर कुछ टैप किया और मोबाइल दिखाते हुए बोला—
“हो गया भैया।”
चाय वाला मुस्कुरा दिया—
“ठीक है साहब।”
लेकिन मेरी नज़र उसके मोबाइल पर पड़ चुकी थी। कोई payment नहीं हुई थी।
सिर्फ कैमरा खुला था।
मैं कुछ क्षण चुप रहा। सोचा शायद नेटवर्क की दिक्कत हो। लेकिन थोड़ी देर बाद दूसरा फेरीवाला आया। फिर वही हुआ।
“स्कैनर है?…”
“हो गया भैया…”
फेरीवाला आगे बढ़ गया।
अब मुझे यकीन हो चुका था। वे दोनों जानबूझकर गरीब लोगों को धोखा दे रहे थे।
लड़की हँसते हुए बोली,
“यार, ये लोग कितने बेवकूफ हैं !”
लड़का भी मुस्कुराया।
उनकी हँसी मेरे कानों में चुभ गई।
मैंने खिड़की के बाहर अंधेरे में देखा। कहीं दूर छोटे-छोटे गाँवों की टिमटिमाती लाइटें दिखाई दे रही थीं। उन्हीं गाँवों से निकलकर शायद ये फेरीवाले अपने परिवार का पेट पालने आते होंगे।
रात गहराती गई। अगले स्टेशन पर ट्रेन कुछ देर रुकी। एक बूढ़ा आदमी डिब्बे में चढ़ा। उसके हाथ में टोकरी थी जिसमें घर के बने पराँठे और अचार के छोटे पैकेट थे। सफेद बाल, थका चेहरा, लेकिन आँखों में उम्मीद।
वह धीमी आवाज़ में बोला—
“घर के बने गरम पराँठे… ले लो बेटा…”
लड़की ने कहा,
“भैया, दो पैकेट देना।”
बूढ़े ने काँपते हाथों से पैकेट दिए।
फिर वही सवाल—
“QR code है?”
बूढ़े ने मुस्कुराकर जेब से पुराना laminated code निकाला।
लड़के ने फिर मोबाइल उठाया और बिना payment किए बोला—
“हो गया बाबा।”
बूढ़ा कुछ पल खड़ा रहा। उसकी आँखें मोबाइल स्क्रीन खोज रही थीं। शायद उसे पूरी तरह भरोसा नहीं हुआ था।
धीरे से बोला—
“बेटा… पैसे आ गए क्या?”
लड़का झुँझलाकर बोला—
“अरे बाबा, बोला ना हो गया!”
बूढ़ा सकुचा गया।
“ठीक है बेटा…”
वह आगे बढ़ गया। लेकिन इस बार मैंने देखा— उसकी आँखों में नमी थी।
कुछ देर बाद मैं वॉशरूम की तरफ गया। वह बूढ़ा वहां दरवाजे के पास खड़ा था। वह अपनी पुराने कीपैड वाले मोबाइल को किसी दूसरे फेरीवाले को दिखा रहा था।
“रामू, जरा देख… पैसे आए क्या?”
दूसरे ने कहा—
“काका, इसमें तो payment वाला message आया ही नहीं।”
बूढ़े ने गहरी साँस ली।
“शायद नेटवर्क नहीं होगा…”
फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोला—
“आज दवा ले जानी थी उसकी…”
“किसकी?” मैंने पूछ लिया।
वह मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोला-
“मेरी पत्नी अस्पताल में है बेटा… सोचा था आज थोड़ा ज्यादा बिक जाएगा तो दवा ले जाऊँगा।”
मेरे भीतर कुछ टूट गया।
मैं तुरंत अपनी सीट पर लौटा। लड़का-लड़की फिर मोबाइल में लगे हँस रहे थे।
मैंने शांत आवाज़ में कहा—
“आप लोगों ने payment नहीं किया था।”
दोनों चौंके। लड़का अकड़कर बोला—
“क्या मतलब?”
मैंने सीधे उसकी आँखों में देखा -“मैं सब देख रहा था। आपने सिर्फ camera खोला था, payment नहीं किया था।”
कुछ क्षण के लिए सन्नाटा छा गया। आसपास बैठे लोग भी उनकी ओर देखने लगे।
लड़की का चेहरा उतर गया।
लड़का बोला—“आपको गलतफहमी हुई है।”
तभी पीछे से वही बूढ़ा गुजर रहा था। मैंने उसे बुलाया।
“काका, आपके पैसे नहीं आए।”
बूढ़ा घबरा गया—
“कोई बात नहीं बेटा… रहने दो…”
उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी… सिर्फ थकान थी।
अब पूरे डिब्बे की नज़र उन दोनों पर थी। लड़के का आत्मविश्वास टूटने लगा। लड़की ने धीरे से कहा— “सॉरी…”
लड़के ने जेब से पैसे निकाले और बूढ़े को दे दिए।
मुझे खुशी थी कि मेरी एक आवाज ने एक गरीब को उसका हक दिला दिया था।
