एक वृद्ध साधु नदी किनारे बैठे थे। एक युवक उनके पास आया।
वह बहुत परेशान था।
“गुरुजी, जीवन में मुझे हर जगह धोखा मिला है। मैं लोगों को माफ़ नहीं कर सकता।”
साधु ने उसे एक भारी पत्थर दिया।
“इसे उठाकर पूरे गाँव का चक्कर लगाओ।”
युवक चल पड़ा।
थोड़ी देर बाद उसके हाथ दुखने लगे।
कुछ और समय बाद कंधे दर्द करने लगे।
वह वापस आकर बोला,
“गुरुजी, यह पत्थर बहुत भारी है।”
साधु मुस्कुराए।
“जिस प्रकार यह पत्थर तुम्हें थका रहा है, उसी प्रकार पुरानी नाराज़गी और क्रोध भी तुम्हें थका रहे हैं।”
“लेकिन जिन्होंने मुझे दुःख दिया, उनका क्या?”
“वे तो अपना रास्ता जा चुके हैं। पत्थर तुम उठा रहे हो।”
युवक चुप हो गया।
उस दिन उसने समझा कि क्षमा दूसरों के लिए नहीं, अपने मन को मुक्त करने के लिए आवश्यक है।
शिक्षा
क्रोध का बोझ उठाने वाला व्यक्ति सबसे अधिक स्वयं पीड़ित होता है।
