खिड़की जो कहीं नहीं जाती

कमरे में एक खिड़की है,
जो खुलती तो है,
पर कहीं जाती नहीं।

हवा आती है—
जैसे किसी और की ज़िंदगी की खबर हो,
जो मुझ तक बस छूकर लौट जाती है।

मैं यहाँ रहता हूँ,
पर “रहना” भी अजीब शब्द है—
जैसे कोई किराये का एहसास हो,
जिसकी मियाद हर महीने खत्म हो जाती है।

दिन में लोग मिलते हैं,
बातें भी होती हैं,
हँसी भी सुनाई देती है,
पर वह सब
मेरे हिस्से में नहीं आता—
जैसे मैं किसी और की कहानी का
साइड कैरेक्टर हूँ।

रात में
जब मोबाइल की स्क्रीन बुझ जाती है,
तब असली सन्नाटा चालू होता है।

कोई नोटिफिकेशन नहीं,
कोई “ऑनलाइन” नहीं—
बस मैं,
और मेरे अंदर चलती
एक धीमी-सी गिनती—

कितने दिन हो गए
किसी ने बिना मतलब
मेरा नाम लेकर बुलाया नहीं।

मैंने सीखा है
खुद से बात करना—
क्योंकि जवाब देने वाला
और कोई नहीं है।

कभी-कभी आईने में देखता हूँ,
तो लगता है—
यह आदमी मैं हूँ,
या बस एक आदत,
जो रोज़ सुबह उठ जाती है
और शाम तक खुद को ढोती रहती है।

अकेलापन शोर नहीं करता,
वह धीरे-धीरे
तुम्हारे भीतर जगह बना लेता है—
जैसे पानी पत्थर में रास्ता बना लेता है।

और फिर एक दिन
तुम पाते हो—
तुम्हारे पास सब कुछ है,
सिवाय उस एक आवाज़ के
जो पूछे—“कैसे हो?”

मैं आज भी ठीक हूँ—
कम से कम दुनिया के हिसाब से।

पर मेरे अंदर
एक जगह है
जहाँ कोई आता नहीं,

और शायद
वहीं पर
मैं सबसे ज़्यादा
ज़िंदा हूँ।

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