जब मैं ज्योतिषी बन गया

जीवन में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जिनकी शुरुआत तो हम करते हैं, लेकिन बाद में लगता है कि वे हमें कहीं और ही ले गईं। मेरी ज्योतिष यात्रा भी कुछ ऐसी ही रही।

यह उन दिनों की बात है जब मैंने स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करके एम.फिल. में प्रवेश लिया था। विवाह नहीं हुआ था, जिम्मेदारियाँ सीमित थीं और जीवन में उत्साह भरपूर था। पढ़ाई के साथ-साथ दोस्तों के साथ इंदौर की गलियों में घूमना, नए-नए व्यंजनों की खोज करना और स्वाद के नए ठिकाने तलाशना हमारी दिनचर्या का हिस्सा था।

इन्हीं दिनों पिताजी के साथ एक दिन राजवाड़ा जाना हुआ। लौटते समय उन्होंने कहा – “चलो, पंडित जी से भी मिलते चलें।”

पंडित जी उनके पुराने मित्र थे। पेशे से सरकारी स्कूल के प्राचार्य थे, लेकिन शाम होते-होते वे ज्योतिषाचार्य बन जाते थे। राजवाड़ा के पास उनका छोटा-सा कार्यालय था, जहाँ कुंडलियों दिखाने के लिए लोगो का आना जाना लगा रहता था।

परिचय हुआ। बातचीत शुरू हुई। और पता नहीं कैसे विषय ज्योतिष पर आ गया। मैं उन दिनों तर्क और विज्ञान का कट्टर समर्थक था।
मैंने बिना किसी भूमिका के कह दिया – “मुझे तो ज्योतिष मिथ्या लगता है।”

पंडित जी मुस्कुराए – “अच्छा! कितनी ज्योतिष की पुस्तकें पढ़ी हैं?”

मैं थोड़ा झेंप गया – “पढ़ी तो कोई नहीं है।”

उन्होंने हँसते हुए कहा -“बिना पढ़े किसी विषय को मिथ्या घोषित कर देना भी अपने आप में एक अद्भुत विद्वता है।”

कमरे में ठहाका गूँज उठा और मैं निरुत्तर हो गया।
फिर उन्होंने अलमारी से एक पुस्तक निकाली और मेरी ओर बढ़ाते हुए बोले – “पहले इसे पढ़ो, फिर आलोचना करना।”

अब चुनौती मेरे सामने थी। मैं गणित का विद्यार्थी था। संख्याएँ, गणनाएँ और तार्किक संरचनाएँ मुझे आकर्षित करती थीं। जिज्ञासावश पुस्तक पढ़ना शुरू किया। पढ़ते-पढ़ते रुचि बढ़ती गई। ग्रहों, भावों, दशाओं और गणनाओं के पीछे की संरचना समझने लगा।

कुछ ही महीनों में स्थिति यह हो गई कि मैं पुस्तक लेकर सीधे पंडित जी के पास पहुँच गया।
“यह योग यहाँ क्यों बना?”
“यह नियम वहाँ क्यों लागू नहीं होगा?”
“यदि यह सही है तो उसका गणितीय आधार क्या है?”

फिर शुरू हुआ शास्त्रार्थ का दौर।
लंबी बहस चलती।
कभी मैं तर्क देता।
कभी वे उदाहरण देते।

कभी वे जीतते।
कभी मैं स्वयं को विजेता घोषित कर देता।
धीरे-धीरे आसपास के लोगों को पता चल गया कि मैं भी ज्योतिष पढ़ रहा हूँ।

बस, यहीं से असली कहानी शुरू हुई।
एक दिन एक परिचित अपनी कुंडली लेकर आ गया।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।

कुछ ही महीनों में मेरे घर का दृश्य किसी छोटे-मोटे ज्योतिष कार्यालय जैसा हो गया।
लगभग प्रतिदिन शाम को यह अघोषित कार्यालय प्रारंभ हो जाता । कोई नौकरी पूछने आता, कोई विवाह और कोई संतान।

लोगों की जिज्ञासाओं का संसार भी अद्भुत था।
एक सज्जन आए और बोले – “पंडित जी, मेरी पदोन्नति कब होगी?”
मैंने कहा – “मैं पंडित जी नहीं हूँ।”
वे बोले -“वह तो ठीक है, लेकिन पदोन्नति कब होगी?”

एक महाशय तो सीधे पूछ बैठे -“मेरे पिता की मृत्यु कब होगी?”
मैंने कहा -“भाई साहब, यह बताने की मेरी कोई इच्छा नहीं है।”
वे बोले – “अनुमान ही बता दीजिए।”
मैंने कहा -“अनुमान लगाना होता तो मौसम विभाग में नौकरी कर लेता!”

धीरे-धीरे घर में लोगों का जमावड़ा बढ़ने लगा।
फिर मेरा विवाह हो गया। शुरुआत में पत्नी ने स्थिति को समझने का प्रयास किया। लेकिन कुछ ही महीनों में उन्हें यह मुफ्त सेवा केंद्र अखरने लगा।

एक दिन उन्होंने पूछा – “ये लोग आते क्यों हैं?”
मैंने कहा -“ज्योतिष पूछने।”
“फीस क्या देते हैं?”
“कुछ नहीं।”
“चाय कौन पिलाता है?”
“हम।”
“और समय किसका जाता है?”
“मेरा।”
मैंने पहली बार महसूस किया कि ग्रहों से अधिक प्रभावशाली शक्ति गृहस्थी की होती है।
फिर संतान का जन्म हुआ।
जिम्मेदारियाँ बढ़ीं। समय का मूल्य समझ आने लगा। धीरे-धीरे मेरा ध्यान कुंडलियों से हटकर कर्म की ओर जाने लगा।

मैंने ज्योतिष की पुस्तकों को सम्मानपूर्वक अलमारी में रख दिया और नौकरी, शोध, परिवार तथा प्रगति पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया।
आज भी लोग कभी-कभी फोन कर लेते हैं।
“जरा कुंडली देख लीजिए।”
“ग्रह क्या कह रहे हैं?”
“भविष्य कैसा रहेगा?”
मैं मुस्कुरा देता हूँ।

जीवन के इस पड़ाव पर आकर मुझे एक बात समझ में आई है। मनुष्य को भविष्य से प्रेम नहीं होता, उसे अनिश्चितता से डर लगता है। वह जानना चाहता है कि आगे क्या होगा ताकि उसकी चिंता कम हो जाए। लेकिन वर्षों के अनुभव के बाद मुझे लगता है कि भविष्य जानने की अपेक्षा वर्तमान को सुधारना अधिक उपयोगी है।

यदि आज आप ईमानदारी से मेहनत कर रहे हैं, सीख रहे हैं, अपने कर्तव्य निभा रहे हैं और अच्छे कर्म कर रहे हैं, तो भविष्य स्वयं अपना रास्ता बना लेता है।

आज जब किसी को ज्योतिषी से लेकर ज्योतिषी तक भटकते देखता हूँ तो मुझे अपने युवा दिनों की याद आ जाती है। और मन ही मन मुस्कुरा कर सोचता हूँ— “भविष्य जान लेने से जीवन नहीं बदलता, लेकिन वर्तमान में किया गया परिश्रम भविष्य अवश्य बदल देता है”।

शायद इसी कारण अब मैं स्वयं को ज्योतिषी नहीं, कर्म-शास्त्री कहना अधिक पसंद करता हूँ। क्योंकि ग्रह चाहे जो संकेत दें, अंततः मनुष्य के जीवन की सबसे शक्तिशाली दशा उसका पुरुषार्थ ही होती है।

🌼 आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है 🌼

क्या यह कहानी आपको पसंद आई?
अपने विचार, सुझाव या अनुभव हमारे साथ साझा करें।

Scroll to Top