ATM के पार
(मंच पर अकेला व्यक्ति। हाथ में मोबाइल। कुछ पल चुप्पी)
मैं रोज़ सुबह उठता हूँ।
किसी आवाज़ से नहीं,
ज़रूरत से।
काम पर जाना है,
तो जाता हूँ।
क्योंकि रुकना मेरे हिस्से में नहीं है।
मैं घर से दूर हूँ।
इतना दूर कि
अब किसी को फर्क ही नहीं पड़ता
कि मैं कैसे रहता हूँ।
दिन भर काम करता हूँ।
पूरी ज़िम्मेदारी से।
क्योंकि मुझे यही सिखाया गया था—
आदमी को देना चाहिए।
(मोबाइल देखता है)
फोन आता है।
घर से।
मैं सोचता हूँ—
शायद कोई पूछेगा,
“तुम ठीक हो?”
“थक तो नहीं गए?”
लेकिन लिखा होता है—
“पैसे भेज देना।”
बस इतना।
ना कोई पूछता है
घर कब आओगे।
ना कोई यह जानना चाहता है
कि मैं बीमार पड़ता हूँ
तो खुद ही दवा क्यों लाता हूँ।
रात को कमरे की बत्ती बंद करता हूँ—
खुद।
और हर महीने
ATM की तरह
काम करता हूँ।
पैसा निकलता है।
आदमी नहीं।
(आवाज़ थोड़ी भारी)
कभी-कभी सोचता हूँ—
अगर मैं एक दिन न रहूँ,
तो क्या कोई कहेगा
“वह अच्छा इंसान था”?
या बस यह पूछेंगे—
“पैसे कहाँ से आएँगे?”
(ठहराव)
मैं शिकायत नहीं कर रहा।
मैं बस यह कह रहा हूँ—
मैं ATM नहीं हूँ।
मैं एक आदमी हूँ।
जिसे भी कभी
कोई पूछ ले—
“तुम कैसे हो?”
तो शायद
थोड़ा कम थक जाए।
(मोबाइल नीचे रख देता है)
पैसा मैं आज भी भेज देता हूँ।
लेकिन मेरा होना…
वह ATM के पार कहीं छूट गया है।
(मौन)
