यह उन दिनों की बात है जब मैंने कॉलेज में नई-नई नौकरी जॉइन की थी। अनुभव कम था, उत्साह भरपूर था और वरिष्ठों की हर बात मुझे आदेश से कम नहीं लगती थी।
हमारे विभाग में एक वरिष्ठ फैकल्टी थे—खटवाकर जी। वे पढ़ाने में कैसे थे, यह तो विद्यार्थी ही बेहतर बता सकते थे, लेकिन काम दूसरे के सिर मढ़ने की कला में उनका कोई सानी नहीं था। बहाना ऐसा बनाते कि सामने वाला मना भी न कर सके और काम कब उसके माथे पर आ जाए, पता ही न चले।
एक दिन परीक्षा चल रही थी। मैं बरामदे से गुजर रहा था कि सामने एक कक्षा में ड्यूटी दे रहे खटवाकर जी ने मुझे हाथ देकर बुलाया।
“अरे सर, ज़रा इधर आइए।”
मैं सम्मानपूर्वक पहुँच गया।
वे थोड़ा असहज चेहरा बनाकर बोले, “बस एक मिनट के लिए वॉशरूम जाना है। आप ज़रा बच्चों पर नज़र रख लीजिए।”
मैं नया था और उनकी एक मिनट की कला से अंजान। तुरंत बोला, “जी सर, बिल्कुल।”
उन्होंने राहत की साँस ली, जैसे कोई भारी जिम्मेदारी मुझे सौंप रहे हों।
मैं कक्षा में खड़ा हो गया। विद्यार्थी उत्तर पुस्तिकाओं में व्यस्त थे और मैं ईमानदारी से निगरानी कर रहा था।
पाँच मिनट बीते…।
फिर दस मिनट…।
फिर बीस मिनट…।
मैंने सोचा, शायद 1 नहीं 2 नंबर के लिए वॉशरूम गए हो।
आधा घंटा बीत गया…।
अब मुझे चिंता होने लगी। मन में विचार आया कि कहीं खटवाकर जी का स्वास्थ्य तो खराब नहीं हो गया!
पैंतालीस मिनट बाद… मैंने गलियारे में झाँका। दूर-दूर तक खटवाकर जी का कोई अता-पता नहीं था।
एक घंटा …पूरा हो गया।
तभी एक अन्य फैकल्टी वहाँ से गुज़रीं। मैंने राहत की साँस लेते हुए पूछा,
“मैडम, खटवाकर जी दिखे क्या? एक मिनट बोलकर गए थे, अभी तक लौटे नहीं।”
मेरी बात सुनते ही उनके चेहरे पर मुस्कान फैल गई। फिर वे हँसी रोकते हुए बोलीं,
“सर, आप अभी भी उनका इंतज़ार कर रहे हैं?”
“जी… क्यों?”
अब तो वे खुलकर हँस पड़ीं।
“अरे सर, अब आपको ही पूरी ड्यूटी देनी है। खटवाकर जी तो अपनी ड्यूटी आपको सौंपकर बहुत पहले निकल चुके हैं।”
मैं स्तब्ध रह गया।
मुझे ऐसा लगा जैसे किसी जादूगर ने मेरी जेब से रूमाल निकालकर पूरा सूट बना लिया हो।
तभी मुझे समझ आया कि उनका “एक मिनट” वास्तव में समय की कोई साधारण इकाई नहीं थी। वह एक विशेष प्रशासनिक तकनीक थी, जिसमें एक मिनट बोलकर पूरा घंटा और पूरी ड्यूटी दूसरे के खाते में ट्रांसफर कर दी जाती थी।
शाम को स्टाफ रूम में खटवाकर जी बड़े आराम से बैठे चाय पी रहे थे। मुझे देखकर मुस्कुराए और बोले,
“सब ठीक रहा न?”
मैंने भी मुस्कुराकर कहा,
“जी सर, आपका एक मिनट बहुत सफल रहा।”
वे मेरी बात का अर्थ समझ गए। चाय का कप होंठों तक ले जाते-ले जाते रुक गया और आसपास बैठे लोग हँस पड़े।
उस दिन के बाद मैंने एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त की— “एक मिनट” से सावधान रहने की। और जहाँ तक खटवाकर जी का सवाल है, वे आज भी मेरी स्मृतियों में कार्य-हस्तांतरण कला के महान आचार्य के रूप में अमर हैं।
