छिपकली कमांडर
बात उन दिनों की है जब मैं हॉस्टल में रहता था। मेरा रूममेट दुबला पतला एक गुजराती लड़का था, लेकिन हमेशा दूसरों पर रौब दिखाने की कोशिश करता था। इन स्वघोषित सूरमा बहादुर जी की एक कमजोरी थी, छिपकली को देखते ही चेहरे का रंग ऐसे उड़ जाता था, जैसे परीक्षा में नकल करते पकड़े गये हो।
एक शाम की बात है, मैं अपने कमरे में किताब पढ़ रहा था और महाशय मोबाइल पर रील देखेने में व्यस्त थे, तभी उनकी नज़र दीवार पर पड़ी।
“अरे… अरे… वो !” उन्होंने काँपती उँगली से इशारा किया।
मैंने देखा—एक नन्ही-सी छिपकली दीवार पर आराम से टहल रही थी, मानो कमरे का किराया उसी ने भरा हो।
“तो?” मैंने पूछा।
“तो क्या? उसे बाहर निकालो!” वे लगभग चिल्ला पडा।
मैने कहा – ” वह तुमसे डर रही होगी।”
“मज़ाक मत करो, जल्दी कुछ करो!”
इतना कहकर वे पलंग पर चढ़ गया। छिपकली दीवार पर थी और बहादुर जी पलंग पर। देखने वालों को लगता कि दोनों में से कौन किससे अधिक डरा हुआ है, इसका मुकाबला चल रहा है।
मैंने लकड़ी उठाई और छिपकली को धीरे-धीरे खिड़की की ओर भगाने लगा। उधर बहादुर जी हर दो सेकंड में कमेंट्री कर रहे थे—
“सावधान!”
“वो इधर आ रही है!”
“अरे, ठीक से!”
लग रहा था जैसे बॉर्डर पर कोई मिशन चल रहा हो।
तभी छिपकली ने दिशा बदली और पलंग की तरफ़ दौड़ गई। बस फिर क्या था! बहादुर जी ने ऐसी छलांग लगाई कि हॉस्टल की एथलेटिक्स टीम का कोच देख लेता तो तुरंत चयन कर लेता।
धड़ाम!
वे सीधे जमीन पर गिरे।
शोर सुनकर पड़ोसी कमरे वाले आ गए।
“क्या हुआ?”
मैंने हँसी रोकते हुए कहा, “कुछ नहीं, हमारे कमरे में एक छिपकली घुस आई थी।”
सभी ने कमरे में झाँका। छिपकली अब भी दीवार पर शांत बैठी थी, जबकि बहादुर जी के चेहरे पर ऐसा तनाव था जैसे उन्होंने अकेले किसी शेर का सामना किया हो।
एक साथी बोला, “भाई, छिपकली तुमसे डर रही है या तुम उससे?”
बहादुर जी ने तुरंत जवाब दिया, “देखो, बहादुरी और बेवकूफ़ी में फर्क होता है।”
कमरे में ठहाका गूँज उठा।
आख़िरकार छिपकली खिड़की से बाहर चली गई। सब लोग लौट गए, लेकिन उस दिन के बाद हॉस्टल में उन बहादुर जी का नया नाम पड़ गया—”छिपकली कमांडर”
जब भी दीवार पर बैठी छिपकली को देखता हूं तो, उससे युद्ध लड़ने को तैयार शेरदिल, मगर डरपोक छिपकली कमांडर की वो घटना याद आ जाती है। 😄
