यह उन दिनों की बात है जब मैंने कॉलेज में नई-नई नौकरी शुरू की थी। आज की तरह हर फैकल्टी के लिए अलग-अलग केबिन नहीं हुआ करते थे। हम सब एक बड़े से स्टाफ रूम में साथ बैठते थे। वहीं पढ़ाई पर चर्चा होती, वहीं राजनीति पर बहस होती, वहीं चाय की चुस्कियों के साथ दुनिया भर की योजनाएँ बनतीं और वहीं लंच भी होता।
सच कहूँ तो सामूहिक जीवन का आनंद ही कुछ और था। किसी का टिफिन सबका टिफिन होता था। किसी के घर के पराठे पूरे स्टाफ की संपत्ति माने जाते थे।
उसी स्टाफ रूम में हमारे साथ एक सज्जन हुआ करते थे—ढगे सर।
ढगे सर अपने आप में एक संस्था थे। उनकी आदतें इतनी अनोखी थीं कि कभी-कभी झुंझलाहट होती थी और कभी-कभी वे पूरे स्टाफ रूम के मनोरंजन का साधन बन जाते थे।
एक दिन दोपहर में हम सब लंच करने बैठे। ढगे सर ने बड़े गर्व से अपना टिफिन खोला। ऊपर की डिब्बी में आलू की सब्जी और नीचे 7-8 गोल-मटोल रोटियाँ सजी हुई थीं।
हम सब भी अपना-अपना टिफिन खोल ही रहे थे कि तभी एक छात्र किसी काम से आ गया।
ढगे सर छात्र से बातचीत में व्यस्त हो गए।
उसी समय न जाने कहाँ से एक मोटा-ताज़ा, आत्मविश्वास से भरा हुआ चूहा प्रकट हुआ।
उसने इधर-उधर देखा, माहौल का निरीक्षण किया और सीधे ढगे सर के टिफिन की ओर बढ़ गया।
ऐसा लग रहा था मानो वह पहले से रेकी करके आया हो।
कुछ ही सेकंड में उसने एक पूरी रोटी मुँह में दबाई और भाग निकला।
ढगे सर के बगल में बैठे तिवारी सर ने यह दृश्य देख लिया।
वे अचानक चिल्लाए—
“अरे ढगे सर! चूहा आपकी रोटी लेकर भाग गया!”
ढगे सर ने छात्र को वहीं छोड़ दिया और ऐसी फुर्ती दिखाई जैसी ओलंपिक में स्वर्ण पदक दाँव पर लगा हो।
“कहाँ गया?”
“उधर… अलमारी के नीचे!”
अब शुरू हुआ —“ऑपरेशन रोटी बचाओ”
ढगे सर ने पास पड़ा एक डंडा उठाया और अलमारी के नीचे ठक-ठक-ठक करने लगे।
उधर चूहा रोटी मुँह में दबाए एक कोने से दूसरे कोने भाग रहा था।
इधर ढगे सर उसके पीछे।
उधर चूहा।
इधर डंडा।
पूरा स्टाफ रूम लंच छोड़कर यह लाइव मैच देखने लगा।
किसी ने कमेंट्री शुरू कर दी—
“चूहा बाएँ से निकला है!”
दूसरे ने कहा—
“ढगे सर, कवर ड्राइव मारिए!”
तीसरा बोला—
“रोटी बचनी चाहिए, चाहे कुछ भी हो जाए!”
लगभग पाँच मिनट तक यह रोमांचक मुकाबला चलता रहा।
आखिरकार ढगे सर विजयी हुए।
उन्होंने चूहे से रोटी छीन ली।
पूरा स्टाफ रूम तालियाँ बजाने लगा।
मैंने सोचा, अब यह रोटी सीधे कूड़ेदान में जाएगी।
लेकिन ढगे सर ने रोटी उठाई, बड़े प्रेम से झाड़-पोंछ की और वापस टिफिन में रख दी।
मैंने घबराकर कहा,
“अरे सर! यह क्या कर रहे हैं? चूहा इसे खा चुका है!”
ढगे सर बिल्कुल शांत थे।
“कुछ नहीं होता।”
“लेकिन चूहा…!”
उन्होंने रोटी का एक छोटा सा कोना तोड़ा और बोले,
“देखिए, जहाँ से चूहे ने काटा था, वह हिस्सा निकाल दिया। अब सब ठीक है।”
हम सब स्तब्ध थे।
ढगे सर ने इत्मीनान से रोटी तोड़ी, सब्जी में डुबोई और खाना शुरू कर दिया।
स्टाफ रूम में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसा परीक्षा हॉल में होता है।
तभी तिवारी सर धीरे से बोले,
“ढगे सर, आप बहादुर हैं या किफ़ायती?”
धगे सर ने जवाब दिया,
“अनुभवी हूँ।”
सब हँस पड़े।
लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई।
अगले दिन लंच का समय हुआ।
ढगे सर ने टिफिन खोला ही था कि किसी ने मज़ाक में कहा—
“सर, पहले गिन लीजिए, आज कितनी रोटियाँ हैं।”
दूसरा बोला—
“और एक रोटी चूहे भाई के लिए अलग निकाल दीजिए।”
तीसरा बोला—
“कल वाले चूहे ने अपने परिवार में आपकी बड़ी प्रशंसा की होगी।”
अब तो रोज़ नया मज़ाक बनने लगा।
कोई कहता—
“सर, आपका और चूहे का भोजन समझौता हो गया क्या?”
कोई पूछता—
“आज चूहा नहीं आया? कहीं छुट्टी पर है क्या?”
एक दिन तो हद ही हो गई।
ढगे सर टिफिन खोलने लगे तो तिवारी सर ने पहले ही घोषणा कर दी—
“सभी लोग सावधान रहें, भोजन प्रारंभ होने वाला है। कृपया चूहे महोदय को भी सूचना दे दी जाए।”
पूरा स्टाफ रूम ठहाकों से गूँज उठा।
ढगे सर बाहर से नाराज़ होते, लेकिन अंदर ही अंदर मुस्कुराते भी थे।
आज वर्षों बाद जब अलग-अलग केबिनों और बंद दरवाज़ों वाले कॉलेजों को देखता हूँ, तो वह पुराना स्टाफ रूम याद आता है।
जहाँ चाय साझा थी, टिफिन साझा था, हँसी साझा थी और कभी-कभी तो रोटी पर चूहे का अधिकार भी साझा हो जाता था।
और ढगे सर?
वे आज भी यादों में उस योद्धा की तरह बसे हुए हैं, जिसने इतिहास में पहली बार चूहे से रोटी छीनकर अपनी थाली में वापस स्थापित कर दी थी। 😄
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